छत्तीसगढ़सारंगढ़ बिलाईगढ़

अनुसूचित जाति कल्याण बजट पर बवाल: गांडा समाज ने उठाई हक की आवाज, कहा – “हमारा हिस्सा कहाँ गया?”

सारंगढ़-बिलाईगढ़/अनुसूचित जाति कल्याण के नाम पर पेश किए गए बजट को लेकर पूरे प्रदेश के गांडा समाज में जबरदस्त आक्रोश देखने को मिल रहा है। समाज के लोगों का साफ कहना है कि जब बजट “अनुसूचित जाति कल्याण” के लिए है, तो फिर उसमें गांडा समाज और घसिया समाज ,देवार, महर,को एक भी फूटी कौड़ी क्यों नहीं दी गई? आखिर किस आधार पर इन समुदायों को दरकिनार कर दिया गया? गांडा समाज ने स्पष्ट किया कि उन्हें सतनामी समाज के विकास से कोई आपत्ति नहीं है। “सतनामी समाज हमारे भाई हैं, उनके विकास से हमें खुशी है,” लेकिन सवाल यह है कि क्या अनुसूचित जाति के अन्य समाज इस बजट में शामिल नहीं हैं? अगर बजट समावेशी है तो फिर चयनात्मक लाभ क्यों? समाज के लोगों का आरोप है कि यह बजट संतुलित और न्यायसंगत नहीं है। अनुसूचित जाति के नाम पर बजट प्रस्तुत किया गया है तो उसमें सभी पात्र समाजों को समान अवसर और संसाधन मिलने चाहिए । केवल कुछ वर्गों को प्राथमिकता देकर बाकी समाजों को नजरअंदाज करना सामाजिक असंतोष को जन्म देता है।

गोपाल प्रसाद बाघे का तीखा बयान

सारंगढ़ बिलाईगढ़ जिले के चौहान गांडा समाज के कार्यकारी जिलाध्यक्ष गोपाल प्रसाद बाघे ने इस बजट को “गांडा समाज विरोधी” करार दिया है। प्रदेश में गांडा जाति की लगभग 14 लाख मतदाता निवासरत है।उसके बाद भी भाजपा सरकार द्वारा जान बूझकर दरकिनार किया जा रहा है।उनका कहना है:
“अनुसूचित जाति कल्याण बजट हमारा अधिकार है, कोई एहसान नहीं। बजट में गांडा समाज और घसिया समाज , महर,देवार,को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है, तो यह हमारे हक और अधिकार का सीधा हनन है। सरकार को बताना होगा कि आखिर हमें इस बजट से बाहर क्यों रखा गया? समाज अब चुप नहीं बैठेगा। यदि जल्द ही स्थिति स्पष्ट नहीं की गई और न्यायसंगत संशोधन नहीं हुआ, तो गांडा समाज पूरे प्रदेश के 33 जिलों में लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज बुलंद करते हुए आंदोलन किया जावेगा।

उठ रहे बड़े सवाल

क्या अनुसूचित जाति कल्याण बजट वास्तव में सभी वर्गों के लिए है? किन मानकों के आधार पर लाभार्थियों का चयन किया गया? गांडा और घसिया समाज को क्यों नहीं मिला हिस्सा? गांडा समाज का कहना है कि यह केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकार का प्रश्न है। जब अधिकारों की बात आती है, तो समाज अब पीछे हटने वाला नहीं है। अब निगाहें सरकार और जनप्रतिनिधियों पर टिकी हैं—क्या वे इस आक्रोश को सुनेंगे, या फिर यह मुद्दा आगे और बड़ा आंदोलन बनेगा?
गांडा समाज ने साफ संदेश दिया है—
“हक की बात है, और हक लेकर रहेंगे।”

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