सारंगढ़-बिलाईगढ़ में ‘मनरेगा’ पर उठे गंभीर सवाल,समय पर काम न मिलने से मजदूर पलायन को मजबूर,लेबर ठेकेदारों के लिए बना ‘अनुकूल माहौल’

सारंगढ़-बिलाईगढ़ न्यूज़: केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (मनरेगा) का मूल उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को उनके ही गांव में प्रतिवर्ष कम से कम 100 दिनों का गारंटीकृत रोजगार देना है, ताकि रोजी-रोटी के लिए उन्हें पलायन न करना पड़े। हालांकि इस सत्र मनरेगा को जी राम जी योजना का नाम देकर प्रशासन मुहूर्त रूप देने की कोशिश में है मगर पूर्व मनरेगा कार्यक्रम और जी राम जी के बीच के समय में पंचायत और ग्रामीणों को रोजगार ना मिल पानी का जिम्मेदार कौन है ?
सारंगढ़ – बिलाईगढ़ जिले में इस योजना के क्रियान्वयन की ज़मीनी हकीकत पर अब कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
फसल कटाई के बाद काम ठप, पलायन की मजबूरी –
स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि जिला गठन के तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी अधिकांश ग्राम पंचायतों में समय पर रोजगार मूलक कार्य शुरू नहीं हो सके हैं। फसल कटाई के बाद का समय वह दौर होता है जब ग्रामीणों को काम की सबसे ज्यादा जरूरत होती है लेकिन ठीक इसी समय पर्याप्त कार्य न खुलने के कारण बड़ी संख्या में मजदूरों को रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों की ओर रुख करना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन की इस ढिलाई से अप्रत्यक्ष रूप से लेबर ठेकेदारों और दलालों को भारी फायदा पहुंच रहा है।
कार्यों के आवंटन में पक्षपात का आरोप :- कहीं करोड़ों के काम, तो कहीं सन्नाटा, जिले में मनरेगा कार्यों के आवंटन की निष्पक्षता पर भी उंगलियां उठ रही हैं।
ग्रामीणों का दावा है कि जिले की कुछ चुनिंदा ग्राम पंचायतों में 1 से 1.5 करोड़ रुपये तक के भारी-भरकम कार्य स्वीकृत किए जाने की खबरें छनकर आ रही है।
इसके विपरीत, कई अन्य ग्राम पंचायतें काम के लिए तरस रही हैं।
स्थानीय निवासियों ने मांग की है कि प्रशासन स्पष्ट करे कि कार्यों के चयन और स्वीकृति के लिए कौन-कौन से मानदंड अपनाए गए थे और किस आधार पर यह असमान आवंटन किया गया।
‘पलायन की त्रासदी’ और कश्मीर में हुई दुखद घटना – रोजगार न मिलने के कारण हो रहे पलायन का दर्द हाल ही में जिले ने गहराई से महसूस किया है। छुईया गांव के निवासी भूपेंद्र भेंना की कश्मीर में हुए एक आतंकवादी हमले में असामयिक मौत हो गई। वे गांव में काम न होने के कारण मजदूरी करने कश्मीर गए थे। इस हृदयविदारक घटना के बाद ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि यदि जिले में समय पर मनरेगा के तहत काम मिला होता, तो भूपेंद्र को अपना घर-परिवार छोड़कर इतनी दूर जान जोखिम में डालने नहीं जाना पड़ता।
उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करने की मांग – ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने छत्तीसगढ़ शासन के आयुक्त (रोजगार गारंटी) से पूरे मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं
किस पंचायत में कितने कार्य स्वीकृत हुए और किन्हें वंचित रखा गया, इसका ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए।
प्रशासनिक चूक या अनियमितता के लिए जिम्मेदार अधिकारियों/कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जाए।
जिले की प्रत्येक ग्राम पंचायत में तत्काल प्रभाव से नए रोजगार मूलक कार्य प्रारंभ किए जाएं ताकि मजदूरों का पलायन रोका जा सके।
नए प्रशासनिक नेतृत्व से पंचायतों को आस –
वर्तमान में जिले में नवपदस्थ जिला पंचायत सीईओ, मनरेगा जिला कार्यक्रम अधिकारी APEO जैसे जिम्मेदार अधिकारियों से विभिन्न ग्राम पंचायतों और ग्रामीणों को काफी उम्मीदें हैं। लोगों का मानना है कि नया प्रशासनिक अमला इन विषमताओं और आरोपों का निष्पक्षता से संज्ञान लेगा तथा प्रत्येक पंचायत को समान रूप से काम उपलब्ध कराकर योजना के मूल उद्देश्यों को धरातल पर उतारेगा।
प्रशासन को अब इन आरोपों पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कमियों को दूर करने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाने की सख्त आवश्यकता है।




